मुख : हिन्दी : आलोक : नौ दो ग्यारह

Can't see Hindi?

Why can't I see the Hindi section?

6.7.08

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हर रोज़ ५०,००० नए सदस्य शामिल हो रहे हैं। ऑर्कुट से कुछ हटकर, मेरी राय में उससे बेहतर। ज़्यादा तेज़। गोपनीयता के लिहाज़ से बेहतर।

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12:49 बजे आलोक द्वारा।
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18.6.08

फ़ायर्फ़ाक्स ३ उतारने का दिन आज है - १८-जून-२००८ - उतारें और हिन्दी प्रदर्शन की समस्याएँ हल करें

फ़ायर्फ़ाक्स ब्राउज़र का नया उद्धरण कल रात भारतीय समयानुसार साढ़े दस बजे उद्घाटित हुआ।

इसका इस्तेमाल करने में हिन्दी के पाठकों और लेखकों को कई फ़ायदे हैं। एक तो यह ज़्यादा तेज़ है, दूसरा आपकी पुराने फ़ायर्फ़ाक्स की टूलबार आदि भी यथावत चलेंगी, और तीसरी सबसे बड़ी बात, हिन्दी के प्रदर्शन में जो समस्याएँ यदा कदा फ़ायर्फ़ाक्स पर आती थीं, वह फ़ायर्फ़ाक्स ३ में बिल्कुल ठीक कर दी गई हैं। तो आप भी उतारिए फ़ायर्फ़ाक्स ३ आज ही -

फ़ायर्फ़ाक्स के आधिकारिक स्थल से एक चटके में डाउनलोड करें

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06:57 बजे आलोक द्वारा।
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11.6.08

गूगल सुझाव, टेक्नोलॉजी, अश्लीलता, और प्रयोक्ता का अनुभव - सुधारना आपके हाथ में है

यह शीर्षक आपको कुछ दिन पहले विनीत खरे जी के लेख के शीर्षक जैसा लगेगा, और यह इसलिए क्योंकि यह लेख उसी पान की दुकान वाले लेख से संबंधित है। इस "समस्या" को देखने के लिए आपको

  1. हिन्दी वाला गूगल लागू करना होगा, पर
  2. खोज अंग्रेज़ी अक्षर s से करनी होगी - वैसे आप स से करें तो भी परिणाम वही होगा :
यानी वयस्कोन्मुख सामग्री को इंगित करने वाले शब्द सुझाए जा रहे हैं।

यही हाल कुछ और अक्षरों की खोज करने पर होता है।

क से ले कर,

फ से ले कर

ब तक।

मेरे द्वारा ली गई तस्वीरें करीब एक महीने पुरानी हैं इसलिए हो सकता है कि आपको इस वक़्त कुछ और परिणाम मिलें।

वास्तव में यह खोज मैंने दफ़्तर में की थी, s से कुछ खोज कर रहा था - स से नहीं - और परिणामों के सुझाव आने लगे, उत्सुकता हुई और तस्वीरें सँजो के रख लीं।

यह है तो समस्या ही, आखिरकार सुझाव तो ठीक है पर देश और काल के आधार पर नैतिकता बदलती है कि नहीं?

विनीत जी का लेख देखने के बाद, और उसपर लिखी टिप्पणियों से यही लगा कि हाँ वास्तव में इन शब्दों की खोज अधिक होती है इसलिए यह सुझाव में आए हैं। कुछ लोगों ने इसे सहज भाव से लिया और कुछ ने नहीं, जैसे कि स्वयं विनीत जी ने।

और सहज भाव से न लेना भी स्वाभाविक ही है, यह भाषा और संस्कृति से इतर है, आप किसी गंभीर विषय पर खोज कर रहे हों और सुझाव ऐसे आने लगें, जब कि आसपास लोग भी बैठे हों तो कैसा रहेगा?

अंग्रेज़ी वाले गूगल में तो सुझाव हमेशा नहीं आते पर हिन्दी वाले में तो हमेशा आते हैं!

बस एक बार अंग्रेज़ी वाले गूगल के जरिए आजमा के देखा - http://google.com/webhp?complete=1&hl=en से अंग्रेज़ी वाले गूगल में सुझाव आते हैं।

और यही पाया कि, अंग्रेज़ी में गूगल अश्लील सुझाव खा गया,

जी हाँ बिल्कुल खा गया,

दुबारा खा गया -

यहाँ भी वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं दिखे,

न यहाँ,

बिल्कुल भी नहीं,

यहाँ थोड़े हैं।

वास्तव में हो क्या रहा है? मैंने एक बार विकल्प में जा के वयस्कोन्मुख सामग्री न हटाने का विकल्प भी चुनने की कोशिश की - वयस्कोन्मुख सामग्री हटाने का विकल्प लागू नहीं था।

यानी क्या? यानी यह, कि गूगल ने मामले की संजीदगी को समझते हुए वयस्कोन्मुख और संभवतः आपत्तिजनक सुझाव हटा दिए हैं - अंग्रेज़ी के लिए कम से कम।

पर फिर हिन्दी में क्यों नहीं? शायद इसलिए कि अभी गूगल हिन्दी सीख रहा है। वैसे, शायद कुछ सुझाव हिन्दी में भी हटाए गए हैं, क्योंकि मैं चकित हुआ था कि च के लिए वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं थे - मतलब कि यह बाला अभी हिन्दी सीख रही है!

विनीत जी ने बात बहुत वाजिब उठाई है, और इस वक़्त हिन्दी के लिए जो सुझाव गूगल पर दिख रहे हैं वह वास्तव में अपरिमार्जित हैं और खोज की आवृत्ति के आधार पर हैं, स्वचालित। लेकिन शायद आपत्तिजनक सुझावों को हटाने की प्रक्रिया अभी उतनी सशक्त नहीं हुई है। लेकिन यह प्रक्रिया मौजूद तो है - यह ज़ाहिर होता है च वाले सुझावों से। इस बारे में गूगल को लिख रहा हूँ, शायद वे इसे और सशक्त करने पर गौर करें।

पर तीन बातें अवश्य सामने आती हैं -

  1. अभी भी बहुत कम लोग गूगल के स्थल के हिन्दी उद्धरण का इस्तेमाल करते हैं। तभी यह मुद्दा अभी तक उछला नहीं। इस्तेमाल करिए - इसके लिए आप वरीयता या प्रिफ़रेंसेज़ में जा सकते हैं। गूगल वाले नज़र रखते हैं कि कौन सी भाषा के पन्नों का इस्तेमाल अधिक हो रहा है। हिन्दी के इस्तेमाल की संख्या बढ़ाइए। हिन्दी के जालस्थलों को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी आपकी है उनका इस्तेमाल करके, और उनपर प्रतिक्रिया दे के। इस काम में भारत सरकार या किसी देवी देवता का कोई जिम्मा नहीं है, यह उत्तरदायित्व आपका है।
  2. जिस व्यक्ति को हिन्दी टंकण आता है उसके लिए S अक्षर छापने पर देवनागरी के परिणाम दिखाना - मुझे तो नहीं जमता, अगर इसे वैकल्पिक बनाने की सुविधा हो तो अच्छा हो। वैसे सुझाव स से भी आते हैं। पर इस समय हिन्दी टंकण न जानने वालों की संख्या कम है अतः यह समस्या इस समय काफ़ी गौण है।
  3. गूगल वालों ने अपने मुख पृष्ठ पर वरीयताएँ को वरियताएँ लिखा है। इसे भी ठीक करवाने के लिए डाक लिख रहा हूँ!

अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!

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17:17 बजे आलोक द्वारा।
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गूगल सुझाव, टेक्नोलॉजी, अश्लीलता, और प्रयोक्ता का अनुभव - सुधारना आपके हाथ में है

यह शीर्षक आपको कुछ दिन पहले विनीत खरे जी के लेख के शीर्षक जैसा लगेगा, और यह इसलिए क्योंकि यह लेख उसी पान की दुकान वाले लेख से संबंधित है। इस "समस्या" को देखने के लिए आपको

  1. हिन्दी वाला गूगल लागू करना होगा, पर
  2. खोज अंग्रेज़ी अक्षर s से करनी होगी - वैसे आप स से करें तो भी परिणाम वही होगा :
यानी वयस्कोन्मुख सामग्री को इंगित करने वाले शब्द सुझाए जा रहे हैं।

यही हाल कुछ और अक्षरों की खोज करने पर होता है।

क से ले कर,

फ से ले कर

ब तक।

मेरे द्वारा ली गई तस्वीरें करीब एक महीने पुरानी हैं इसलिए हो सकता है कि आपको इस वक़्त कुछ और परिणाम मिलें।

वास्तव में यह खोज मैंने दफ़्तर में की थी, s से कुछ खोज कर रहा था - स से नहीं - और परिणामों के सुझाव आने लगे, उत्सुकता हुई और तस्वीरें सँजो के रख लीं।

यह है तो समस्या ही, आखिरकार सुझाव तो ठीक है पर देश और काल के आधार पर नैतिकता बदलती है कि नहीं?

विनीत जी का लेख देखने के बाद, और उसपर लिखी टिप्पणियों से यही लगा कि हाँ वास्तव में इन शब्दों की खोज अधिक होती है इसलिए यह सुझाव में आए हैं। कुछ लोगों ने इसे सहज भाव से लिया और कुछ ने नहीं, जैसे कि स्वयं विनीत जी ने।

और सहज भाव से न लेना भी स्वाभाविक ही है, यह भाषा और संस्कृति से इतर है, आप किसी गंभीर विषय पर खोज कर रहे हों और सुझाव ऐसे आने लगें, जब कि आसपास लोग भी बैठे हों तो कैसा रहेगा?

अंग्रेज़ी वाले गूगल में तो सुझाव हमेशा नहीं आते पर हिन्दी वाले में तो हमेशा आते हैं!

बस एक बार अंग्रेज़ी वाले गूगल के जरिए आजमा के देखा - http://google.com/webhp?complete=1&hl=en से अंग्रेज़ी वाले गूगल में सुझाव आते हैं।

और यही पाया कि, अंग्रेज़ी में गूगल अश्लील सुझाव खा गया,

जी हाँ बिल्कुल खा गया,

दुबारा खा गया -

यहाँ भी वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं दिखे,

न यहाँ,

बिल्कुल भी नहीं,

यहाँ थोड़े हैं।

वास्तव में हो क्या रहा है? मैंने एक बार विकल्प में जा के वयस्कोन्मुख सामग्री न हटाने का विकल्प भी चुनने की कोशिश की - वयस्कोन्मुख सामग्री हटाने का विकल्प लागू नहीं था।

यानी क्या? यानी यह, कि गूगल ने मामले की संजीदगी को समझते हुए वयस्कोन्मुख और संभवतः आपत्तिजनक सुझाव हटा दिए हैं - अंग्रेज़ी के लिए कम से कम।

पर फिर हिन्दी में क्यों नहीं? शायद इसलिए कि अभी गूगल हिन्दी सीख रहा है। वैसे, शायद कुछ सुझाव हिन्दी में भी हटाए गए हैं, क्योंकि मैं चकित हुआ था कि च के लिए वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं थे - मतलब कि यह बाला अभी हिन्दी सीख रही है!

विनीत जी ने बात बहुत वाजिब उठाई है, और इस वक़्त हिन्दी के लिए जो सुझाव गूगल पर दिख रहे हैं वह वास्तव में अपरिमार्जित हैं और खोज की आवृत्ति के आधार पर हैं, स्वचालित। लेकिन शायद आपत्तिजनक सुझावों को हटाने की प्रक्रिया अभी उतनी सशक्त नहीं हुई है। लेकिन यह प्रक्रिया मौजूद तो है - यह ज़ाहिर होता है च वाले सुझावों से। इस बारे में गूगल को लिख रहा हूँ, शायद वे इसे और सशक्त करने पर गौर करें।

पर तीन बातें अवश्य सामने आती हैं -

  1. अभी भी बहुत कम लोग गूगल के स्थल के हिन्दी उद्धरण का इस्तेमाल करते हैं। तभी यह मुद्दा अभी तक उछला नहीं। इस्तेमाल करिए - इसके लिए आप वरीयता या प्रिफ़रेंसेज़ में जा सकते हैं। गूगल वाले नज़र रखते हैं कि कौन सी भाषा के पन्नों का इस्तेमाल अधिक हो रहा है। हिन्दी के इस्तेमाल की संख्या बढ़ाइए। हिन्दी के जालस्थलों को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी आपकी है उनका इस्तेमाल करके, और उनपर प्रतिक्रिया दे के। इस काम में भारत सरकार या किसी देवी देवता का कोई जिम्मा नहीं है, यह उत्तरदायित्व आपका है।
  2. जिस व्यक्ति को हिन्दी टंकण आता है उसके लिए S अक्षर छापने पर देवनागरी के परिणाम दिखाना - मुझे तो नहीं जमता, अगर इसे वैकल्पिक बनाने की सुविधा हो तो अच्छा हो। वैसे सुझाव स से भी आते हैं। पर इस समय हिन्दी टंकण न जानने वालों की संख्या कम है अतः यह समस्या इस समय काफ़ी गौण है।
  3. गूगल वालों ने अपने मुख पृष्ठ पर वरीयताएँ को वरियताएँ लिखा है। इसे भी ठीक करवाने के लिए डाक लिख रहा हूँ!

अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!

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09:11 बजे आलोक द्वारा।
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5.6.08

ये http और www क्या है? क्या http माने जालस्थल और www माने चिट्ठा?

पिछले कुछ दिनों में कुछ लेख पढ़ने को मिले जिनसे ऐसा लगा कि इस www और http के बारे में खुलासा देना ज़रूरी है। आखिरकार आप स्वादिष्ट भोजन खाते हैं, तो यह उत्सुकता तो होती ही है न कि उसमें डाला क्या गया है? पकाया कैसे गया है? उसी तरह भले ही आप केवल जालस्थलों के पाठक हों, या केवल चिट्ठा चलाते हों तो भी यह पता होना अच्छा ही है कि किसी भी जालस्थल के पते के मायने क्या हैं। दरअसल जब तक मैं भी केवल खाता ही था, पकाता नहीं था, इन सब शब्दों के बारे में मुझे भी कई भ्रान्तियाँ थीं, और इन भ्रान्तियों के चलते मैंने कई लोगों को अनजाने में ही सही, पर गुमराह भी किया है।

इसलिए यह वाजिब ही है कि इस विषय में अब तक जो सीखा है उसे आपके सामने रखूँ और इस सिलसिले में और ज्ञान भी पाऊँ।

पहले समझते हैं कि यूआरऍल - यूनिफ़ार्म रिसोर्स लोकेटर - "संसाधनों के समरूपी पते" के क्या अंश होते हैं, एक उदाहरण के साथ।

http://translate.google.com/translate_t/?langpair=hi|en
  1. पहला हिस्सा - http:// - है प्रोटोकॉल। यह बताता है कि इस पते तक पहुँचने के लिए आपके ब्राउज़र को किस कंप्यूटरी भाषा का प्रयोग करना होगा। एक तरह से, यह वास्तव में पता नहीं है, श्री, सुश्री की तरह सम्बोधन जैसा है।
  2. दूसरा हिस्सा - पहली बिन्दु तक - translate - यह उपडोमेन है। इसके बारे में थोड़ी देर में, पहले तीसरे हिस्से को समझ लें।
  3. तीसरा हिस्सा - पहले / तक - google.com - यह डोमेन है। डोमेन वास्तव में एक (अधिकतम १२ अंकों की) संख्या होता है, पर इंसानों को नंबर से ज़्यादा नाम याद रहते हैं, इसलिए डोमेन नामों का प्रचलन है। इस १२ अंक की संख्या को आईपी कहते हैं। और आईपी से डोमेन नाम तथा डोमेन नाम से आईपी पता लगाने की निर्देशिका का काम डोमेन नाम सर्वर करते हैं। इसे डीएनएस प्रबन्धन भी कहा जाता है।
  4. चौथा हिस्सा - ? तक - translate_t/ - यह पथ है। जालस्थल जिस सर्वर पर है, वहाँ अलग अलग फ़ाइलें अलग अलग निर्देशिकाओं में होती हैं। उनका पथ डोमेन नाम के ठीक बाद रहता है।
  5. पाँचवाँ हिस्सा - ? के बाद - langpair=hi|en - परिमाण हैं। किसी पथ पर मौजूद फ़ाइल को कोई और परिमाण प्रदान करने हों तो इसका इस्तेमाल होता है।

आइए अब समझते हैं कि http क्या है और www क्या है। http तो वास्तव में संबोधन ही है, पता नहीं है। http के अलावा ftp, news, file, https आदि संबोधन भी होते हैं। किसी भी जालस्थल के लिए http या https का संबोधन ही लगेगा। आपने देखा होगा कि यदि आप अपने ब्राउज़र में अगर http:// नहीं लिखते हैं तो भी वह स्वतः ही आगे श्री या सुश्री की तरह http:// चेंप देता है।

www - ऊपर दिए गए उदाहरण में दूसरा अंश - उपडोमेन का है। जिस प्रकार ऊपर translate एक उपडोमेन है, उसी तरह www भी एक उपडोमेन का नाम हो सकता है। उपडोमेन का यह लाभ है कि एक ही डोमेन नाम लेने के बावजूद आप पाँच छः अलग अलग सर्वरों पर अलग अलग उपडोमेन रख सकते हैं। अगर आप चाहें तो एक का दूसरे से वास्ता भी नहीं हो। उदाहरणार्थ, blogspot.com वालों ने एक ही डोमेन का पैसा दे के अलग अलग प्रयोक्ताओं को अलग अलग उपडोमेन में चिट्ठे बनाने की सुविधा दी है। उपडोमेन होना अनिवार्य नहीं है, अगर आप अपने डोमेन पर एक ही स्थल चाहते हैं तो कोई आवश्यक नहीं है कि उपडोमेन रहे।

तो फिर यह www है क्या?

एक परंपरा सी बन गई है कि अगर किसी स्थल का उपडोमेन न हो तो उसका उपडोमेन www मान लिया जाता है। इसीलिए, अधिकतर डीएनएस प्रबन्धक आजकल www.example.com और example.com दोनो को एक दूसरे का पर्यायवाची बनाने का विकल्प देते हैं। यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन पाठकगण यह उम्मीद करते हैं कि www.example.com और example.com एक ही चीज़ होगी इसलिए यह परंपरा चल पड़ी है।

क्या http: का मतलब चिट्ठा, और www का मतलब जालस्थल?

जी नहीं। चिट्ठा वास्तव में है क्या? एक खास प्रारूप में जानकारी प्रदान करने वाला जालस्थल ही तो। और कुछ नहीं।

http का इस्तेमाल तो हर जालस्थल को पुकारने के लिए होगा - चाहे वह चिट्ठा हो या नहीं। यह मात्र संबोधन है। www एक उपडोमेन है, पारंपरिक उपडोमेन, जो किसी भी डोमेन के आगे लगाया जा सकता है। चाहें वह डोमेन चिट्ठे का हो या किसी और स्थल का।

एक उदाहरण के साथ समझते हैं।

अगर आप

तो एक ही पन्ना खुलता है - क्योंकि www और बिना उपडोमेन वाल स्थल हैं तो अलग अलग, लेकिन एक ही जगह अग्रेषित किए गए हैं।

लेकिन ऍडसेंस निर्माता गोकुल राजाराम के स्थल, पर देखिए -

उन्होंने यह अग्रेषण लागू नहीं किया है! यह अग्रेषण करना ज़रूरी नहीं है, बस पाठकों के लिए सुविधाजनक है इसलिए इसकी परंपरा बन गई है।

आशा है अब चश्मे के बाहर लगी धूल साफ़ हो गई होगी।

या उँगलियों के निशान रह गए हैं?

पुनश्च - पिछले सन्देश के बारे में बाल किशन जी ने पूछा है कि क्या मैं उनकी डोमेन, डाक पते आदि संबधी मदद करूँगा क्या। जवाब यही है कि जी हाँ बिल्कुल। और केवल बाल किशन जी ही नहीं, यदि आप में से किसी और को भी कोई प्रश्न हों तो बेधड़क पूछें।

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02:11 बजे आलोक द्वारा।
6 छींटाकसी
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3.6.08

सिर्फ़ पाँच मिनट और चार कदमों में अपने पते को meraanaam@gmail.com के बजाय mera@meraanaam.in करें, और पुराना पता भी जारी रखें

आइए आज देखते हैं कि आप अपने फ़ोकटी जीमेल के पते के बजाय अपने डोमेन वाले पते का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। और वह भी पुराना पता गँवाए बगैर।

  1. आपको एक डोमेन खरीदना होगा। .इन डोमेन ८०० रुपए सालाना में मिलते हैं।
  2. इसके बाद अपने डोमेन के डीऍनऍस प्रबन्धन में जा के मेल फ़ॉर्वर्ड का विकल्प चुन लें। मैंने ज़ोनएडिट का इस्तेमाल किया है।
  3. इसके बाद इस प्रकार जानकारी प्रदान करें। - * @ meraanaam . in is forwarded to meraanaam @ gmail . com और जोड़ दें।
  4. आपको चेतावनी दी जाएगी, Are you sure you want to do this? This will delete your MX records. यहाँ पर हाँ चुनें और आगे बढ़ें।

हो गया काम। ऊपर * देने का अर्थ है कि इस डोमेन की सारी डाक एक ही पते पर अग्रेषित की जाए। अगर आप कोई खास नाम चाहते हैं तो * के बजाय कुछ और दें जैसे कि अपना नाम। ऐसा करने से केवल meraanaam@meraanaam.in को भेजी डाक आपतक पहुँचेगी पर kuchhbhi@meraanaam.in वाली डाक आप तक नहीं पहुँचेगी। एक से अधिक प्रविष्टियाँ भी डाल सकते हैं।

अब, आप अपनी जीमेल की डाक पेटी में, अपनी जीमेल वाली डाक के साथ साथ, meraanaam . इन वाली डाक भी पा सकेंगे।

यह तो हुई डाक प्राप्त करने की बात। लेकिन उसी पते से डाक भेजेंगे कैसे? चार कदम और –

  1. अपने जीमेल खाते में सेटिंग्स पर जा के “खाते” वाले खाँचे में जाएँ – अंग्रेज़ी में यह ऍकाउण्ट्स के नाम से मिलेगा।
  2. यहाँ पर अपना नया डाक पता भी प्रविष्ट कर दें। आपसे पुष्टि करने को कहा जाएगा, कुछ समय बाद पुष्टि डाक आएगी, पुष्टि कर दें कि यह पता आपका ही है।
  3. पत्रोत्तर/उत्तरापेक्षी – में आप विकल्प चुन सकते हैं कि जिस खाते से डाक आई है, उसी नाम से जवाब भी दिया जाए। इस प्रकार, @gmail वाली डाक का जवाब @gmail से ही, और @meraanaam वाली डाक का जवाब @meraanaam से ही दिया जा सकता है।
  4. नई चिट्ठी लिखने का प्रयास करें। अब आपको प्रेषक वाले कोष्ठक में भी विकल्प मिलेगा, कि किस नाम से डाक भेजनी है। आप खाते के जमाव में यह भी तय कर सकते हैं कि किस पते को वरीयता दी जाए, ताकि आप फ़टाफ़ट अपनी इच्छानुसार, जीमेल या अपने नाम वाली डाक भेज सकें।

बस, हो गया काम। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह। कूटशब्द एक ही याद रखना है, डाक जाँचने के लिए बस एक ही जगह देखना है, लेकिन आएगी दोनो जगहों से!

कुछ और नुस्खे, वैकल्पिक –

  1. आप चाहें तो एक नज़र में पता लगा सकते हैं कि डाक कौन से खाते से आई है। इसके लिए छननी बना लें – यदि प्राप्तकर्ता @ meraanaam . in है तो उसपर चिप्पी लगा दें, और चिप्पी को अलग रंग दे दें।
  2. अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी जीमेल के बजाय @meranaam .in का इस्तेमाल करना शुरू कर दें, तो बस हर डाक का जवाब @meraanaam .in वाले पते से देना शुरू कर दें। धीरे धीरे वही अधिक प्रचलित हो जाएगी, और जीमेल वाली डाक तो आपके पास आएगी ही।
  3. abuse@ meraanaam .in , postmaster@ meraanaam .in पर खास नज़र रखें, इनके लिए जीमेल में अलग छननी बना के रख सकते हैं।
  4. अपने जालस्थलों और चिट्ठों और हस्ताक्षर में नया पता लिखना न भूलें!

है न पाँच मिनट का काम?

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15:24 बजे आलोक द्वारा।
4 छींटाकसी
इस लेख के हवाले
11.4.08

ऍचटीऍमऍल, जायज़ और नाजायज़, रबर की पटरियाँ और रबर के प्लेटफ़ार्मों के बारे में चन्द बातें और एक सवाल

पिछले लेख में ऍचटीऍमऍल वैध और अवैध होने की बात लिखी थी तो कुछ लोगों ने इस बारे में और जानना चाहा इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ। थोड़ी रेलगाड़ी वाली भाषा में समझाता हूँ। जिन्हें वैध ऍचटीऍमऍल के बारे में पता है वे तब तक इस लेख के नीचे दिए सवाल का जवाब देने का प्रयास करें।

रेल, पटरी पर चलती है। रेल के अन्दर आप चाहें ठंडे डब्बे बनाएँ, गद्दी वाले बनाएँ, सिर्फ़ कुर्सी वाले बनाएँ, या रसोई बनाएँ। शौचालय बनाएँ या चादर तकिए रखने के लिए गोदाम। आपकी मर्ज़ी है। डिब्बों का रंग लाल पीला नीला जो भी रखें, चाहें तो मालगाड़ी के डब्बे लगाएँ। बस दो बातें आपको याद रखनी ज़रूरी हैं - डब्बे के पहिये पटरी के हिसाब से हों, उनमें बने खाँचे पटरी में बैठ जाएँ। उसे आप नहीं बदल सकते, और दूसरा बिजली के तार से छुआने वाली चिमटी - जो इंजन के ऊपर होती है, वह सही तरह से बैठे। डब्बे के अन्दर, बाहर, जो चाहें करें, पर ऊपर और नीचे इन चीज़ों का खयाल रखना ज़रूरी है।

अब रेल के डब्बे के बदले आप अपने जालस्थल को लें, और पटरी व चिमटी(क्या कहते हैं उसे?) को आप मानक मानें। जालस्थल में आप जो भी चाहें लिखें, दिखाएँ, लिखवाएँ, वह दौड़ेगा जब तक आपकी ऍचटीऍमऍल मानक हो। इस स्थल की ऍचटीऍमऍल - को खोल के देखें - View -> Source कर के। आपको सबसे ऊपर एक पंक्ति दिखेगी -

<!DOCTYPE html PUBLIC "-//W3C//DTD XHTML 1.0 Strict//EN" "http://www.w3.org/TR/xhtml1/DTD/xhtml1-strict.dtd">

यह बताता है कि पटरी कौन सी है।

किसी और स्थल पर आपको दूसरे तरह की पंक्ति दिख सकती है - जैसे

<!DOCTYPE HTML PUBLIC "-//W3C//DTD HTML 4.01 Transitional//EN" "http://www.w3.org/TR/html4/loose.dtd">

यह आपको बताता है कि पटरी कौन सी है - छोटी लाइन या बड़ी लाइन। और भी तरह की होती हैं जैसे ऍचटीऍमऍल ट्रांज़िशनल आदि। सभी पटरियों की सूची आपको यहाँ मिलेगी

इस पंक्ति के बाद ही रेलगाड़ी के डब्बे लगने शुरू होते हैं - <html> से शुरू हो कर। और उन डब्बों का पटरी के अनुरूप होना ज़रूरी है। आखिरी डब्बा होता है </html> ऍचटीऍमऍल रेल से इस तरह थोड़ी अलग है कि यहाँ डब्बों के अन्दर डब्बे होते हैं - जैसे,

<html>
<head>
<title>
शीर्षक
</title>
<body>
और डब्बे और उन डब्बों में बहुत से डब्बे
</body>
</html>

पर आप अपनी मर्ज़ी से डब्बों का नाम नहीं रख सकते, वैध डब्बों का नाम, उसकी डीटीडी यानी डॉक्युमेण्ट टाइप डेफ़िनिशन में होता है। इन सभी पटरियों की माँ है ऍसजीऍमऍल, स्टैण्डर्ड जनरल मार्कप लैंग्वेज। इस के अधीन अलग अलग डीटीडी बना के ऍचटीऍमऍल, डब्लूऍमऍल (वैप फ़ोनों के लिए), और ऍक्सऍमऍल(चिट्ठों की बौछारों के लिए) की पटरियाँ बनाई गई हैं।

इस भाषा में तीन तरह की चीज़ें हैं - डब्बे का नाम, डब्बे की ख़ासियतें और डब्बे के अन्दर का माल।

<a href="http://example.com">उदाहरण</a>

यहाँ पर डब्बे का नाम है a (ऍङ्कर), डब्बे की खासियतें है (खास या ख़ास?) href, और डब्बे के अन्दर का माल है "उदाहरण"।

पटरी का मानक या डीटीडी यह बताता है कि कौन से डब्बे के अन्दर कौन कौन से डब्बे आ सकते हैं, और उनकी क्या क्या खासियतें बताई जा सकती हैं।

किसी पन्ने का ऍचटीऍमऍल सही है या नहीं, यह पता लगाने के लिए एक औज़ार है - वैलिडेटर.डब्लू३.ऑर्ग - इसके अलावा और भी कई औज़ार हैं, जिनसे यह पता लगाया जा सकता है।

अब आपका यही सवाल है न कि ऍचटीऍमऍल मानक न हो तो भी गाड़ी पटरी पर चल कैसे रही थी? चक्कर यह है कि प्लेट्फ़ार्म - यानी ब्राउज़र - और रेलगाड़ियाँ - यानी जालस्थल - पहले बन गए थे, पर पटरियाँ कुछ समय बाद बनीं। इसलिए ये प्लेट्फ़ार्म कंक्रीट के नहीं बने हैं, रबर के हैं, थोड़ी बहुत खींचतान करके भी काम चल जाता है। इतना ही नहीं, प्लेटफ़ॉर्म बनाने वाले ठेकेदार भी अलग अलग हैं - इंटर्नेट ऍक्स्प्लोरर, फ़ायर्फ़ाक्स, सफ़ारी, ऑपेरा और न जाने कितने। सभी को वही गाड़ी अपने प्लेटफ़ार्म पर रुकवानी है तो मानके के हिसाब से रेलगाड़ी को भी चलना होगा और मानक के हिसाब से ही प्लेटफ़ार्म को भी सही आकार देना होगा।

हमें लग सकता है कि ऍचटीऍमऍल अवैध होते हुए भी चल रही थी, पर ज़रा किसी अवैध स्थल को अलग अलग प्लेटफ़ार्मों पर चला के देखिए। वैध ऍचटीऍमऍल सभी पर एक सी दिखेगी, अवैध में थोड़ा फ़र्क दिखेगा। यह भी हो सकता है कि वैध ऍचटीऍमऍल किसी प्लेटफ़ार्म पर ठीक से न दिखे, पर वह अधिकांशतः इसीलिये होता है कि वह प्लेटफ़ार्म ठीक से नहीं बना है। जिस दिन प्लेटफ़ार्म वाले नया उद्धरण ले आएँगे, उस दिन हो सकता है वहाँ गाड़ी की टक्कर होनी शुरू हो जाए।

उम्मीद है इन रबर की पटरियों के बारे में यह जानकारी पर्याप्त होगी। इन प्लेट्फ़ार्मों के अलावा जालस्थलों को मोबाइलों से भी पढ़ा जाता है, और जाल खोजक तथा बौछार खोजक यन्त्र भी इन्हें पढ़ते हैं - वह प्लेट्फ़ार्म से नहीं आते, दूसरी तरफ़ से चढ़ते हैं - पटरी की दूसरी तरफ़ से। पर वांछा उन्हें भी यही होती है कि पटरी के हिसाब से रेलगाड़ी हो।

आशा है अब वैध ऍचटीऍमऍल की आवश्यकता से एक आविष्कार की इच्छा पैदा हो गई होगी। आविष्कार के बारे में आगे। तब तक जाँचिए अपनी रेलगाड़ी को।

अन्ततः एक सवाल - वैलण्टाइन डे पर चूहे ने बिल्ली को क्या कहा?

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14:12 बजे आलोक द्वारा।
3 छींटाकसी
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1.11.07

दावा

Review My Blog at HindiBlogs.org बस यही नहीं समझ आता कि अपनी ही चीज़ के लिए बार बार दावा क्यों ठोंकना पड़ता है। वैसे हिंदी ब्लॉग्स की शक्लोसूरत इतनी बढ़िया है कि नौ दो ग्यारह होने का मन ही नहीं करता। मैं वहाँ कम से कम २० मिनट तो बिता ही चुका हूँ। बस ऊपर तस्वीर में जो लिखा है वह हिंदी में होता तो मज़ा आ जाता।

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20:21 बजे आलोक द्वारा।
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