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फ़ायर्फ़ाक्स ब्राउज़र का नया उद्धरण कल रात भारतीय समयानुसार साढ़े दस बजे उद्घाटित हुआ।
इसका इस्तेमाल करने में हिन्दी के पाठकों और लेखकों को कई फ़ायदे हैं। एक तो यह ज़्यादा तेज़ है, दूसरा आपकी पुराने फ़ायर्फ़ाक्स की टूलबार आदि भी यथावत चलेंगी, और तीसरी सबसे बड़ी बात, हिन्दी के प्रदर्शन में जो समस्याएँ यदा कदा फ़ायर्फ़ाक्स पर आती थीं, वह फ़ायर्फ़ाक्स ३ में बिल्कुल ठीक कर दी गई हैं। तो आप भी उतारिए फ़ायर्फ़ाक्स ३ आज ही -
फ़ायर्फ़ाक्स के आधिकारिक स्थल से एक चटके में डाउनलोड करें
06:57 बजे आलोक द्वारा।यह शीर्षक आपको कुछ दिन पहले विनीत खरे जी के लेख के शीर्षक जैसा लगेगा, और यह इसलिए क्योंकि यह लेख उसी पान की दुकान वाले लेख से संबंधित है। इस "समस्या" को देखने के लिए आपको
यही हाल कुछ और अक्षरों की खोज करने पर होता है।
क से ले कर,
फ से ले कर
ब तक।
मेरे द्वारा ली गई तस्वीरें करीब एक महीने पुरानी हैं इसलिए हो सकता है कि आपको इस वक़्त कुछ और परिणाम मिलें।
वास्तव में यह खोज मैंने दफ़्तर में की थी, s से कुछ खोज कर रहा था - स से नहीं - और परिणामों के सुझाव आने लगे, उत्सुकता हुई और तस्वीरें सँजो के रख लीं।
यह है तो समस्या ही, आखिरकार सुझाव तो ठीक है पर देश और काल के आधार पर नैतिकता बदलती है कि नहीं?
विनीत जी का लेख देखने के बाद, और उसपर लिखी टिप्पणियों से यही लगा कि हाँ वास्तव में इन शब्दों की खोज अधिक होती है इसलिए यह सुझाव में आए हैं। कुछ लोगों ने इसे सहज भाव से लिया और कुछ ने नहीं, जैसे कि स्वयं विनीत जी ने।
और सहज भाव से न लेना भी स्वाभाविक ही है, यह भाषा और संस्कृति से इतर है, आप किसी गंभीर विषय पर खोज कर रहे हों और सुझाव ऐसे आने लगें, जब कि आसपास लोग भी बैठे हों तो कैसा रहेगा?
अंग्रेज़ी वाले गूगल में तो सुझाव हमेशा नहीं आते पर हिन्दी वाले में तो हमेशा आते हैं!
बस एक बार अंग्रेज़ी वाले गूगल के जरिए आजमा के देखा - http://google.com/webhp?complete=1&hl=en से अंग्रेज़ी वाले गूगल में सुझाव आते हैं।
और यही पाया कि, अंग्रेज़ी में गूगल अश्लील सुझाव खा गया,
जी हाँ बिल्कुल खा गया,
दुबारा खा गया -
यहाँ भी वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं दिखे,
न यहाँ,
बिल्कुल भी नहीं,
यहाँ थोड़े हैं।
वास्तव में हो क्या रहा है? मैंने एक बार विकल्प में जा के वयस्कोन्मुख सामग्री न हटाने का विकल्प भी चुनने की कोशिश की - वयस्कोन्मुख सामग्री हटाने का विकल्प लागू नहीं था।
यानी क्या? यानी यह, कि गूगल ने मामले की संजीदगी को समझते हुए वयस्कोन्मुख और संभवतः आपत्तिजनक सुझाव हटा दिए हैं - अंग्रेज़ी के लिए कम से कम।
पर फिर हिन्दी में क्यों नहीं?
शायद इसलिए कि अभी गूगल हिन्दी सीख रहा है। वैसे, शायद कुछ सुझाव हिन्दी में भी हटाए गए हैं, क्योंकि मैं चकित हुआ था कि च के लिए वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं थे -
मतलब कि यह बाला अभी हिन्दी सीख रही है!
विनीत जी ने बात बहुत वाजिब उठाई है, और इस वक़्त हिन्दी के लिए जो सुझाव गूगल पर दिख रहे हैं वह वास्तव में अपरिमार्जित हैं और खोज की आवृत्ति के आधार पर हैं, स्वचालित। लेकिन शायद आपत्तिजनक सुझावों को हटाने की प्रक्रिया अभी उतनी सशक्त नहीं हुई है। लेकिन यह प्रक्रिया मौजूद तो है - यह ज़ाहिर होता है च वाले सुझावों से। इस बारे में गूगल को लिख रहा हूँ, शायद वे इसे और सशक्त करने पर गौर करें।
पर तीन बातें अवश्य सामने आती हैं -
अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!
17:17 बजे आलोक द्वारा।यह शीर्षक आपको कुछ दिन पहले विनीत खरे जी के लेख के शीर्षक जैसा लगेगा, और यह इसलिए क्योंकि यह लेख उसी पान की दुकान वाले लेख से संबंधित है। इस "समस्या" को देखने के लिए आपको
यही हाल कुछ और अक्षरों की खोज करने पर होता है।
क से ले कर,
फ से ले कर
ब तक।
मेरे द्वारा ली गई तस्वीरें करीब एक महीने पुरानी हैं इसलिए हो सकता है कि आपको इस वक़्त कुछ और परिणाम मिलें।
वास्तव में यह खोज मैंने दफ़्तर में की थी, s से कुछ खोज कर रहा था - स से नहीं - और परिणामों के सुझाव आने लगे, उत्सुकता हुई और तस्वीरें सँजो के रख लीं।
यह है तो समस्या ही, आखिरकार सुझाव तो ठीक है पर देश और काल के आधार पर नैतिकता बदलती है कि नहीं?
विनीत जी का लेख देखने के बाद, और उसपर लिखी टिप्पणियों से यही लगा कि हाँ वास्तव में इन शब्दों की खोज अधिक होती है इसलिए यह सुझाव में आए हैं। कुछ लोगों ने इसे सहज भाव से लिया और कुछ ने नहीं, जैसे कि स्वयं विनीत जी ने।
और सहज भाव से न लेना भी स्वाभाविक ही है, यह भाषा और संस्कृति से इतर है, आप किसी गंभीर विषय पर खोज कर रहे हों और सुझाव ऐसे आने लगें, जब कि आसपास लोग भी बैठे हों तो कैसा रहेगा?
अंग्रेज़ी वाले गूगल में तो सुझाव हमेशा नहीं आते पर हिन्दी वाले में तो हमेशा आते हैं!
बस एक बार अंग्रेज़ी वाले गूगल के जरिए आजमा के देखा - http://google.com/webhp?complete=1&hl=en से अंग्रेज़ी वाले गूगल में सुझाव आते हैं।
और यही पाया कि, अंग्रेज़ी में गूगल अश्लील सुझाव खा गया,
जी हाँ बिल्कुल खा गया,
दुबारा खा गया -
यहाँ भी वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं दिखे,
न यहाँ,
बिल्कुल भी नहीं,
यहाँ थोड़े हैं।
वास्तव में हो क्या रहा है? मैंने एक बार विकल्प में जा के वयस्कोन्मुख सामग्री न हटाने का विकल्प भी चुनने की कोशिश की - वयस्कोन्मुख सामग्री हटाने का विकल्प लागू नहीं था।
यानी क्या? यानी यह, कि गूगल ने मामले की संजीदगी को समझते हुए वयस्कोन्मुख और संभवतः आपत्तिजनक सुझाव हटा दिए हैं - अंग्रेज़ी के लिए कम से कम।
पर फिर हिन्दी में क्यों नहीं?
शायद इसलिए कि अभी गूगल हिन्दी सीख रहा है। वैसे, शायद कुछ सुझाव हिन्दी में भी हटाए गए हैं, क्योंकि मैं चकित हुआ था कि च के लिए वयस्कोन्मुख सुझाव नहीं थे -
मतलब कि यह बाला अभी हिन्दी सीख रही है!
विनीत जी ने बात बहुत वाजिब उठाई है, और इस वक़्त हिन्दी के लिए जो सुझाव गूगल पर दिख रहे हैं वह वास्तव में अपरिमार्जित हैं और खोज की आवृत्ति के आधार पर हैं, स्वचालित। लेकिन शायद आपत्तिजनक सुझावों को हटाने की प्रक्रिया अभी उतनी सशक्त नहीं हुई है। लेकिन यह प्रक्रिया मौजूद तो है - यह ज़ाहिर होता है च वाले सुझावों से। इस बारे में गूगल को लिख रहा हूँ, शायद वे इसे और सशक्त करने पर गौर करें।
पर तीन बातें अवश्य सामने आती हैं -
अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!
09:11 बजे आलोक द्वारा।पिछले कुछ दिनों में कुछ लेख पढ़ने को मिले जिनसे ऐसा लगा कि इस www और http के बारे में खुलासा देना ज़रूरी है। आखिरकार आप स्वादिष्ट भोजन खाते हैं, तो यह उत्सुकता तो होती ही है न कि उसमें डाला क्या गया है? पकाया कैसे गया है? उसी तरह भले ही आप केवल जालस्थलों के पाठक हों, या केवल चिट्ठा चलाते हों तो भी यह पता होना अच्छा ही है कि किसी भी जालस्थल के पते के मायने क्या हैं। दरअसल जब तक मैं भी केवल खाता ही था, पकाता नहीं था, इन सब शब्दों के बारे में मुझे भी कई भ्रान्तियाँ थीं, और इन भ्रान्तियों के चलते मैंने कई लोगों को अनजाने में ही सही, पर गुमराह भी किया है।
इसलिए यह वाजिब ही है कि इस विषय में अब तक जो सीखा है उसे आपके सामने रखूँ और इस सिलसिले में और ज्ञान भी पाऊँ।
पहले समझते हैं कि यूआरऍल - यूनिफ़ार्म रिसोर्स लोकेटर - "संसाधनों के समरूपी पते" के क्या अंश होते हैं, एक उदाहरण के साथ।
http://translate.google.com/translate_t/?langpair=hi|en
आइए अब समझते हैं कि http क्या है और www क्या है। http तो वास्तव में संबोधन ही है, पता नहीं है। http के अलावा ftp, news, file, https आदि संबोधन भी होते हैं। किसी भी जालस्थल के लिए http या https का संबोधन ही लगेगा। आपने देखा होगा कि यदि आप अपने ब्राउज़र में अगर http:// नहीं लिखते हैं तो भी वह स्वतः ही आगे श्री या सुश्री की तरह http:// चेंप देता है।
www - ऊपर दिए गए उदाहरण में दूसरा अंश - उपडोमेन का है। जिस प्रकार ऊपर translate एक उपडोमेन है, उसी तरह www भी एक उपडोमेन का नाम हो सकता है। उपडोमेन का यह लाभ है कि एक ही डोमेन नाम लेने के बावजूद आप पाँच छः अलग अलग सर्वरों पर अलग अलग उपडोमेन रख सकते हैं। अगर आप चाहें तो एक का दूसरे से वास्ता भी नहीं हो। उदाहरणार्थ, blogspot.com वालों ने एक ही डोमेन का पैसा दे के अलग अलग प्रयोक्ताओं को अलग अलग उपडोमेन में चिट्ठे बनाने की सुविधा दी है। उपडोमेन होना अनिवार्य नहीं है, अगर आप अपने डोमेन पर एक ही स्थल चाहते हैं तो कोई आवश्यक नहीं है कि उपडोमेन रहे।
तो फिर यह www है क्या?
एक परंपरा सी बन गई है कि अगर किसी स्थल का उपडोमेन न हो तो उसका उपडोमेन www मान लिया जाता है। इसीलिए, अधिकतर डीएनएस प्रबन्धक आजकल www.example.com और example.com दोनो को एक दूसरे का पर्यायवाची बनाने का विकल्प देते हैं। यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन पाठकगण यह उम्मीद करते हैं कि www.example.com और example.com एक ही चीज़ होगी इसलिए यह परंपरा चल पड़ी है।
क्या http: का मतलब चिट्ठा, और www का मतलब जालस्थल?
जी नहीं। चिट्ठा वास्तव में है क्या? एक खास प्रारूप में जानकारी प्रदान करने वाला जालस्थल ही तो। और कुछ नहीं।
http का इस्तेमाल तो हर जालस्थल को पुकारने के लिए होगा - चाहे वह चिट्ठा हो या नहीं। यह मात्र संबोधन है। www एक उपडोमेन है, पारंपरिक उपडोमेन, जो किसी भी डोमेन के आगे लगाया जा सकता है। चाहें वह डोमेन चिट्ठे का हो या किसी और स्थल का।
एक उदाहरण के साथ समझते हैं।
अगर आप
लेकिन ऍडसेंस निर्माता गोकुल राजाराम के स्थल, पर देखिए -
आशा है अब चश्मे के बाहर लगी धूल साफ़ हो गई होगी।
या उँगलियों के निशान रह गए हैं?
पुनश्च - पिछले सन्देश के बारे में बाल किशन जी ने पूछा है कि क्या मैं उनकी डोमेन, डाक पते आदि संबधी मदद करूँगा क्या। जवाब यही है कि जी हाँ बिल्कुल। और केवल बाल किशन जी ही नहीं, यदि आप में से किसी और को भी कोई प्रश्न हों तो बेधड़क पूछें।
02:11 बजे आलोक द्वारा।आइए आज देखते हैं कि आप अपने फ़ोकटी जीमेल के पते के बजाय अपने डोमेन वाले पते का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। और वह भी पुराना पता गँवाए बगैर।
हो गया काम। ऊपर * देने का अर्थ है कि इस डोमेन की सारी डाक एक ही पते पर अग्रेषित की जाए। अगर आप कोई खास नाम चाहते हैं तो * के बजाय कुछ और दें जैसे कि अपना नाम। ऐसा करने से केवल meraanaam@meraanaam.in को भेजी डाक आपतक पहुँचेगी पर kuchhbhi@meraanaam.in वाली डाक आप तक नहीं पहुँचेगी। एक से अधिक प्रविष्टियाँ भी डाल सकते हैं।
अब, आप अपनी जीमेल की डाक पेटी में, अपनी जीमेल वाली डाक के साथ साथ, meraanaam . इन वाली डाक भी पा सकेंगे।
यह तो हुई डाक प्राप्त करने की बात। लेकिन उसी पते से डाक भेजेंगे कैसे? चार कदम और –
बस, हो गया काम। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह। कूटशब्द एक ही याद रखना है, डाक जाँचने के लिए बस एक ही जगह देखना है, लेकिन आएगी दोनो जगहों से!
कुछ और नुस्खे, वैकल्पिक –
है न पाँच मिनट का काम?
15:24 बजे आलोक द्वारा।पिछले लेख में ऍचटीऍमऍल वैध और अवैध होने की बात लिखी थी तो कुछ लोगों ने इस बारे में और जानना चाहा इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ। थोड़ी रेलगाड़ी वाली भाषा में समझाता हूँ। जिन्हें वैध ऍचटीऍमऍल के बारे में पता है वे तब तक इस लेख के नीचे दिए सवाल का जवाब देने का प्रयास करें।
रेल, पटरी पर चलती है। रेल के अन्दर आप चाहें ठंडे डब्बे बनाएँ, गद्दी वाले बनाएँ, सिर्फ़ कुर्सी वाले बनाएँ, या रसोई बनाएँ। शौचालय बनाएँ या चादर तकिए रखने के लिए गोदाम। आपकी मर्ज़ी है। डिब्बों का रंग लाल पीला नीला जो भी रखें, चाहें तो मालगाड़ी के डब्बे लगाएँ। बस दो बातें आपको याद रखनी ज़रूरी हैं - डब्बे के पहिये पटरी के हिसाब से हों, उनमें बने खाँचे पटरी में बैठ जाएँ। उसे आप नहीं बदल सकते, और दूसरा बिजली के तार से छुआने वाली चिमटी - जो इंजन के ऊपर होती है, वह सही तरह से बैठे। डब्बे के अन्दर, बाहर, जो चाहें करें, पर ऊपर और नीचे इन चीज़ों का खयाल रखना ज़रूरी है।
अब रेल के डब्बे के बदले आप अपने जालस्थल को लें, और पटरी व चिमटी(क्या कहते हैं उसे?) को आप मानक मानें। जालस्थल में आप जो भी चाहें लिखें, दिखाएँ, लिखवाएँ, वह दौड़ेगा जब तक आपकी ऍचटीऍमऍल मानक हो। इस स्थल की ऍचटीऍमऍल - को खोल के देखें - View -> Source कर के। आपको सबसे ऊपर एक पंक्ति दिखेगी -
<!DOCTYPE html PUBLIC "-//W3C//DTD XHTML 1.0 Strict//EN" "http://www.w3.org/TR/xhtml1/DTD/xhtml1-strict.dtd">
यह बताता है कि पटरी कौन सी है।
किसी और स्थल पर आपको दूसरे तरह की पंक्ति दिख सकती है - जैसे
<!DOCTYPE HTML PUBLIC "-//W3C//DTD HTML 4.01 Transitional//EN" "http://www.w3.org/TR/html4/loose.dtd">
यह आपको बताता है कि पटरी कौन सी है - छोटी लाइन या बड़ी लाइन। और भी तरह की होती हैं जैसे ऍचटीऍमऍल ट्रांज़िशनल आदि। सभी पटरियों की सूची आपको यहाँ मिलेगी।
इस पंक्ति के बाद ही रेलगाड़ी के डब्बे लगने शुरू होते हैं - <html> से शुरू हो कर। और उन डब्बों का पटरी के अनुरूप होना ज़रूरी है। आखिरी डब्बा होता है </html> ऍचटीऍमऍल रेल से इस तरह थोड़ी अलग है कि यहाँ डब्बों के अन्दर डब्बे होते हैं - जैसे,
<html>
<head>
<title>
शीर्षक
</title>
<body>
और डब्बे और उन डब्बों में बहुत से डब्बे
</body>
</html>
पर आप अपनी मर्ज़ी से डब्बों का नाम नहीं रख सकते, वैध डब्बों का नाम, उसकी डीटीडी यानी डॉक्युमेण्ट टाइप डेफ़िनिशन में होता है। इन सभी पटरियों की माँ है ऍसजीऍमऍल, स्टैण्डर्ड जनरल मार्कप लैंग्वेज। इस के अधीन अलग अलग डीटीडी बना के ऍचटीऍमऍल, डब्लूऍमऍल (वैप फ़ोनों के लिए), और ऍक्सऍमऍल(चिट्ठों की बौछारों के लिए) की पटरियाँ बनाई गई हैं।
इस भाषा में तीन तरह की चीज़ें हैं - डब्बे का नाम, डब्बे की ख़ासियतें और डब्बे के अन्दर का माल।
<a href="http://example.com">उदाहरण</a>
यहाँ पर डब्बे का नाम है a (ऍङ्कर), डब्बे की खासियतें है (खास या ख़ास?) href, और डब्बे के अन्दर का माल है "उदाहरण"।
पटरी का मानक या डीटीडी यह बताता है कि कौन से डब्बे के अन्दर कौन कौन से डब्बे आ सकते हैं, और उनकी क्या क्या खासियतें बताई जा सकती हैं।
किसी पन्ने का ऍचटीऍमऍल सही है या नहीं, यह पता लगाने के लिए एक औज़ार है - वैलिडेटर.डब्लू३.ऑर्ग - इसके अलावा और भी कई औज़ार हैं, जिनसे यह पता लगाया जा सकता है।
अब आपका यही सवाल है न कि ऍचटीऍमऍल मानक न हो तो भी गाड़ी पटरी पर चल कैसे रही थी? चक्कर यह है कि प्लेट्फ़ार्म - यानी ब्राउज़र - और रेलगाड़ियाँ - यानी जालस्थल - पहले बन गए थे, पर पटरियाँ कुछ समय बाद बनीं। इसलिए ये प्लेट्फ़ार्म कंक्रीट के नहीं बने हैं, रबर के हैं, थोड़ी बहुत खींचतान करके भी काम चल जाता है। इतना ही नहीं, प्लेटफ़ॉर्म बनाने वाले ठेकेदार भी अलग अलग हैं - इंटर्नेट ऍक्स्प्लोरर, फ़ायर्फ़ाक्स, सफ़ारी, ऑपेरा और न जाने कितने। सभी को वही गाड़ी अपने प्लेटफ़ार्म पर रुकवानी है तो मानके के हिसाब से रेलगाड़ी को भी चलना होगा और मानक के हिसाब से ही प्लेटफ़ार्म को भी सही आकार देना होगा।
हमें लग सकता है कि ऍचटीऍमऍल अवैध होते हुए भी चल रही थी, पर ज़रा किसी अवैध स्थल को अलग अलग प्लेटफ़ार्मों पर चला के देखिए। वैध ऍचटीऍमऍल सभी पर एक सी दिखेगी, अवैध में थोड़ा फ़र्क दिखेगा। यह भी हो सकता है कि वैध ऍचटीऍमऍल किसी प्लेटफ़ार्म पर ठीक से न दिखे, पर वह अधिकांशतः इसीलिये होता है कि वह प्लेटफ़ार्म ठीक से नहीं बना है। जिस दिन प्लेटफ़ार्म वाले नया उद्धरण ले आएँगे, उस दिन हो सकता है वहाँ गाड़ी की टक्कर होनी शुरू हो जाए।
उम्मीद है इन रबर की पटरियों के बारे में यह जानकारी पर्याप्त होगी। इन प्लेट्फ़ार्मों के अलावा जालस्थलों को मोबाइलों से भी पढ़ा जाता है, और जाल खोजक तथा बौछार खोजक यन्त्र भी इन्हें पढ़ते हैं - वह प्लेट्फ़ार्म से नहीं आते, दूसरी तरफ़ से चढ़ते हैं - पटरी की दूसरी तरफ़ से। पर वांछा उन्हें भी यही होती है कि पटरी के हिसाब से रेलगाड़ी हो।
आशा है अब वैध ऍचटीऍमऍल की आवश्यकता से एक आविष्कार की इच्छा पैदा हो गई होगी। आविष्कार के बारे में आगे। तब तक जाँचिए अपनी रेलगाड़ी को।
अन्ततः एक सवाल - वैलण्टाइन डे पर चूहे ने बिल्ली को क्या कहा?
14:12 बजे आलोक द्वारा।
बस यही नहीं समझ आता कि अपनी ही चीज़ के लिए बार बार दावा क्यों ठोंकना पड़ता है। वैसे हिंदी ब्लॉग्स की शक्लोसूरत इतनी बढ़िया है कि नौ दो ग्यारह होने का मन ही नहीं करता। मैं वहाँ कम से कम २० मिनट तो बिता ही चुका हूँ। बस ऊपर तस्वीर में जो लिखा है वह हिंदी में होता तो मज़ा आ जाता।लेबल: अंतर्जाल, अन्तर्जाल, निर्देशिका, निर्देशिकाएँ, संगणक, सङ्गणक
20:21 बजे आलोक द्वारा।
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