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21.8.07

प्रेमचंद की ओट में शिकार

देखो, शब्द कहीं से लो, अरबी, फारसी, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी कहीं का हो, ख्याल रहे कि ख्यालात का तसब्बुर और ज़वान की रवानगी ........ भाषा की प्रवहमानता और विचारों का क्रम बना रहे। - —प्रेमचन्द [उपेन्द्रनाथ अश्क को लिखे पत्र से साभार] तसव्वुर, रवानगी - शूँ छे? विचार कुंज से साभार।

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14:27 बजे आलोक द्वारा।
5 छींटाकसी
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