हाँ भई हाँ।
public class Welcome {
public static void main(String[] args) {
String[] स्वागत = new String[3];
स्वागत[0] = "जावा में आपका स्वागत है!";
स्वागत[1] = "आलोक द्वारा";
स्वागत[2] = "हिन्दी में";
for (int i = 0; i < स्वागत.length; ++i)
{
System.out.println(स्वागत[i]);
}
}
}
पर थोड़े से घच्चे हैं, मैंने int i के बदले int क करने की कोशिश की तो इक्लिप्स बैठ गया। शायद यह इक्लिप्स की त्रुटि हो। इसके अलावा क्लास का नाम Welcome के बजाय स्वागतम् करने पर भी दिक्कत आई। खोजबीन जारी है।
मेरी एक प्रिय मित्र किरण के साथ इस बारे में पहले भी बात हो चुकी थी, मैं हिंदी की दुनिया में इस से परेशान था और वह तेलुगु में। तो अंततः किरण के अनुरोध पर लिख रहा हूँ, हो सकता है औरों के भी काम में यह आए। अफ़सोस कि मेरी तेलुगु इतनी अच्छी नहीं है इसलिए हिंदी में ही लिख रहा हूँ।
इस लेख का प्रारूप एक सवाल जवाब के तौर पर है, तो पढ़िए और फिर अपने विचार भी सामने रखिए।
मेरा एक चिट्ठा है और उस पर मैं जब भी कुछ लिखता हूँ तो लोग बेहूदी, गंदी टिप्पणियाँ करते हैं। मन करता है कि अपना चिट्ठा बंद कर दूँ। क्या करूँ?
आपकी समस्य बहुत आम समस्या है, पर घबराइए नहीं इसका निदान है। सबसे पहले यह देखिए कि क्या आपने जो लिखा है वह आपत्तिजनक तो नहीं? क्या उसमें कोई ऐसी चीज़ है जो आप किसी के घर की बैठक में बैठ के नहीं बोल सकेंगे? यह हुई पहली बात।
दूसरी बात, आपके विचारों पर टिप्पणी हो रही है या आप पर? दोनो में फ़र्क करें। केवल विचारों पर की टिप्पणी पर ध्यान दें और आप के ऊपर की टिप्पणी को नज़रंदाज़ करें। यह भी ध्यान दें कि आपके विचारों से असहमति का मतलब यह नहीं है कि आपके साथ बदतमीज़ी की जा रही है। तर्कों और ठोस जानकारी के आधार पर अपने विचारों और विपरीत विचारों की तुलना करके प्रतिक्रिया करें। आप पाएँगे कि "लिखना छोड़ देता हूँ" जैसे विचार आपके पास आने कम हो जाएँगे और लोगों की प्रतिक्रियाओं का आप स्वागत करना शुरू कर देंगे।
तीसरी बात, अपने पाठकों को आदरपूर्वक कहिए कि टिप्पणियाँ यह सोच के करें कि आप मेरे घर की बैठक में मुझसे मिलने आए हैं और बात कर रहे हैं। आप पाएँगे कि बेहूदी टिप्पणियों की संख्या ८० फ़ीसदी कम हो गई है।
मैं एक डाक सूची का सदस्य हूँ और वहाँ पर मैं जब भी कोई सवाल पूछता हूँ तो लोग मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। क्या करूँ?
तो उड़ाने दें। उन्हें धन्यवाद दें, और कहें कि मुझे अपने सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला है, यदि कोई और दे सकता है तो कृपा होगी। आप पाएँगे कि धीरे धीरे डाक सूची का माहौल बदल गया है।
मेरी डाक सूची हिंदी/तेलुगु में है पर लोग अंग्रेज़ी में लिखते हैं। ज़रूरी नहीं कि सबको अंग्रेज़ी समझ आए। ऐसे लोगों पर मुझे बहुत गुस्सा आता है। क्या करूँ?
ऐसे लेखों को नज़रंदाज़ कर दें। कुछ लोग दुनिया में अब भी ऐसे हैं जो समझते हैं कि हिंदी या तेलुगु में लिख कर वे दुनिया पर अहसान कर रहे हैं और अंग्रेज़ी सबको आती है, नज़रंदाज़ करना ही सबसे सरल तरीका है। साथ ही प्रत्येक अंग्रेज़ी में लिखे संदेश के एवज में आप दो चार संदेश तेलुगु/हिंदी में भेजें। यही आपका प्रतिशोध है।
मैं एक ऑन्लाइन समुदाय (मंच, संकलक, डाक सूची) का संचालक हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि कुछ लोग सिर्फ़ लड़ाई करने, गाली गलौज करने ही जाल पर आते हैं। क्या किया जाए?
ऐसे लोगों को किसी अच्छे कार्य में लगाने के लिए प्रेरित करें, जैसे कि अनुवाद कार्य, विकिपीडिया में योगदान या किसी बड़ी पुस्तक आदि को ऑन्लाइन प्रकाशित करना। इस प्रकार का व्यवहार यही दर्शाता है कि लोगों को दूसरों के साथ मिल-जुल कर ही संतुष्टि मिलती है, फिर उसके लिए गाली ही क्यों न देनी पड़े। इस संतुष्टि को दूसरी तरह से प्रदान करें, ताकि लोगों को अपने कार्यों से संतुष्टि मिले। इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है तमिळ ऑन्लाइन जगत् जिसने बहुत अच्छे अच्छे काम किए हैं। यह भी सोचिए कि आप खुद किसलिए अंतर्जाल पर आते हैं। क्या आपके सामने कोई लक्ष्य हैं?
बस इतना ही। आशा है तेलुगु अनुवाद सरलता से हो जाएगा। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह। आपको कुछ और जोड़ना हो तो टिप्पणियों में कहिएगा। शब्बा खैर।
वैसे तो इन हाई-फ़ाइव वालों से मैं बहुत परेशान ही हूँ क्योंकि जान न पहचान वाले हिसाब से खाता खोलने के संदेसे आते रहते हैं, लेकिन आज तो गज़ब हो गया, जब हिंदी में संदेसा आया -
तो पता चला कि इन्होंने वाकई सब कुछ हिंदी में कर रखा है। मज़ा आ गया।
लेबल: तकनीक
13:10 बजे आलोक द्वारा।एक महीने पहले कटे चालान का सिलसिला आज खत्म हुआ।
यूँ गुज़रा यह खात्मा –
१. तारीख थी १७ जनवरी २००९ की – शनिवार की – शनिवार को कचहरी गया तो कहा कि सोमवार को आओ। पेट्रोल फुँका।
२. आज, यानी सोमवार, सुबह दस बजे कचहरी पहुँच गया। चालान की पर्ची मुझसे ले ली गई। कहा बारह बजे आओ।
३. बारह बजे एक जगह दस्तखत करने को कहा गया। कर दिया।
४. १२२० पर मैजिस्ट्रेट ने बुलाया और सौ रुपए का जुर्माना लिया।
५. १२२५ पर दस्तावेज़ वापस मिल गए। कहानी खत्म।
मेरा कुल खर्चा –
१. पैसे – १०० रुपए, और दो बार कचहरी आना जाना – कुल २२० रुपए।
२. वक़्त – ४ घंटे।
सरकार का खर्चा –
१. एक अदद पुलिसवाले द्वारा चालान की पर्ची अदालत भेजना – कुछ ३० मिनट।
२. एक अदद क्लर्क द्वारा चालान की पर्ची को एक किताब में दर्ज करना – कुछ ३० मिनट ।
३. एक अदद मैजिस्ट्रेट द्वारा सुनवाई – कुछ १० मिनट।
४. एक अदद क्लर्क द्वारा गाड़ी के दस्तावेज़ वापस करना – कुछ १५ मिनट।
५. आमदनी – सौ रुपए।
मुझे तो गुनाह की सज़ा मिलनी ही चाहिए थी, पर सरकार फालतू में पिस गई।
वैसे कचहरी में इत्ता सारा कागज़ देख के वहाँ से फ़टाफ़ट नौ दो ग्यारह होने का मन कर रहा था।
अंत भला सो भला।
मतलब मैं तो वही सब करता हूँ जो हिंदुस्तान के सभी धंधेबाज़ करते हैं, फिर पता नहीं मेरे शेयर ही क्यों पिट रहे हैं? लगता है यहाँ कलियुग पूरी तरह आया नहीं है।
३९ के भाव पे उठा लिया है, कल मोहर्रम की वजह से बाज़ार बंद थे, आज देखते हैं क्या होता है।
लेबल: धंधा
06:59 बजे आलोक द्वारा।बड़े दिनों से तमन्ना थी कि कोई अपने से भी सवाल जवाब करे। तो यही मान लेते हैं कि अपना साक्षात्कार हो रहा है।
आलोक कुमार
ठीक है प्रकाशित नहीं कर रहे(मन ही मन बोल दिया)
यही वाला है, यही जहाँ आप अभी खड़े हैं
२००४ में शायद, या २००३ में।
हम पढ़ते हैं अपने चक्षुओ से। यानी आँखों से।
हम खुद ही लिखते हैं किसी से लिखवाते नहीं हैं।
कंप्यूटर, लैप्टॉप, मोबाइल फ़ोन
इंस्क्रिप्ट
यार पूछ तो लिया एक बार कितनी बार बताएँ
इत्ता कौन याद रखेगा। रही होंगी कुछ, गूगल में देख लो।
पहले तो आवश्यक्ता नहीं आवश्यकता होता है। यानी आपका सवाल है कि २००८ में हिंदी ब्लॉगजगत में मुख्यतः किन विषयों पर आवश्यकता व अपेक्षा से अधिक लिखा गया। मेरी राय में हिंदी में लिखा कुछ भी कम ही है। तो किसी भी विषय पर नहीं।
फिर वही आवश्यक्ता। ज़रूरत ही बोल लो। कम लिखा गया पुरुषों के अधिकारों और ज़िंदा रहने के लिए अंग्रेज़ी के महत्व के बारे में
पता नहीं, गूगल भइया से पता कर लें
इत्ता कौन याद रखे
कित्ती बार पूछोगे
अच्छा अब समझ आया पहली दूसरी तीसरी पूछ रहे हैं
अब यह सवाल तो समझ नहीं आया। पहले पाँच ब्लॉगरों में से पहला पूछते तो कुछ अलग जवाब आता क्या?
तीन में दूसरा – अब समझ आया पिछले सवाल का मतलब।
अभी पहले पर अटके हैं, ये बताओ कुछ इनाम विनाम मिल रहा है क्या, तो अपना नाम दे दें।
पूछ तो लिया है एक बार
पुण्य प्रसून कौन है?
नहीं करना चाहेंगे
इतिहास किस्म के सवाल हम गोल करते हैं, गणित वाले हाँ ना वाले पूछो।
वही कामाग्नि, वासना, मस्तराम वगैरह वगैरह
संभावनाएँ हैं विषय सही होना चाहिए – ऊपर देखें
क्या हिंदी में लिखने वाले अपने आप पर हँस सकते हैं? अपने ऊपर किए मज़ाक को हँस के टाल सकते हैं? अगर नहीं तो यही कठिनाई है और कुछ नहीं
यह मौका देने का बहुत शुक्रिया। कितने सालों का अरमान पूरा हुआ। अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह।
है तो तेलुगु में – किताबों की समीक्षा, शायद ये कुछ समय बाद हिंदी में भी कर दें। हाँ इतना पता चल रहा है कि बात क्या हो रही है। हैदराबाद के आईx3 टी की छात्रा ने बनाया है इसे।
अपने गाँव ढकोली वाले घर में लग गया ब्रॉडबैंड आज के दिन। मज़ा आ गया। अब इस बहुमूल्य बैंडविड्थ रूपी पेट्रोल को मैं भी यूट्यूब, ट्विटर, चिट्ठाचर्चा, चिट्ठाजगत यानी ऑन्लाइन मटरगश्ती में बरबाद कर सकता हूँ।
अहो भाग्य हमारे कि भारत के उन पचास लाख सौभाग्यशालियों में शामिल हुए।
लेबल: तकनीक
17:00 बजे आलोक द्वारा।
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